“Jharkhand Government must stop Government of India’s misadventure with Rice Fortification – State Goverment should not distribute Fortified Rice in the State and should instead focus on holistic approaches to nutrition”

Fact Finding Report can be downloaded here

“Jharkhand Government must stop Government of India’s misadventure with Rice Fortification – State Goverment should not distribute Fortified Rice in the State and should instead focus on holistic approaches to nutrition”

Ranchi, 11th May 2022: At the end of a 3-day fact-finding visit in Jharkhand by Right To Food Campaign (RTFC) and Alliance for Sustainable & Holistic Agriculture (ASHA-Kisan Swaraj), team members urged Jharkhand Government to stop distribution of fortified rice in the state immediately. The Fact Finding Report was released in a press conference here today. The report points to the many serious concerns with regard to indiscriminate distribution of fortified rice to poor households in the state, and in Anganwadis and schools.

The fact-finding team stressed that in Jharkhand, even as there are high levels of anaemia, there is a significant proportion of adivasi population amongst whom various blood disorders like Thalassemia and Sickle Cell Anaemia exist. For the population with these blood disorders, fortified iron is not an answer. In fact, the FSSAI’s regulations on fortified foods ask for mandatory labelling, with a (warning) statement that asks Thalassemia patients to consume such iron-fortified food under medical supervision. It further warns/advises sickle cell anaemia patients not to consume iron-fortified food.

“On the one hand, the government understands the health risks of consumption of iron fortified food for many people with particular health conditions in our society, and brings in regulations like this. On the other hand, the government itself is distributing such rice in all its food schemes where the poor have no option but to depend on this entitlement for their food security. What is more, in Jharkhand due to lack of population-based screening, people with these health conditions may not know that they have these blood disorders; further, the government is also distributing such rice without any proper information to or dialogue with the communities”, pointed out the fact finding team. Field visits also showed that many people do not prefer consuming this rice and are even separating and removing the fortified rice kernels before cooking and consuming the rice.

The fact-finding team included Dr Vandana Prasad, a public health expert also associated with the Right To Food Campaign; Kavitha Kuruganti, farmers’ rights activist with ASHA-Kisan Swaraj; Balram and James Herenz of Right to Food Campaign, Jharkhand; Rohin Kumar of Greenpeace India; Soumik Banerjee of ASHA-Kisan Swaraj and Raj Shekhar Singh of Right to Food Campaign National Secretariat. The team visited on 8th, 9th and 10th of May 2022 five villages in Khunti and East Singhbhum districts where they met with PDS beneficiaries, dealers, CHC doctors, ASHA and Anganwadi workers, cooks in Anganwadis and schools, officials and patients in district level hospitals, one rice mill owner and so on. They met with Jamshedpur East MLA Mr Saryu Roy and Chakuliya MLA Mr Samir Mohanty. Team members also interacted with concerned state level officials, and also met with Cabinet Minister Dr Rameshwar Oraon.

“Fortified rice is not a proven approach to tackle anaemia effectively, as per published papers and reviews. It is surprising that the Government of India, in a hasty blanket approach, has already scaled up distribution of fortified rice to 257 districts across India, even though the so-called ‘pilots’ have not completed three years, nor evaluated, nor findings put out in the public domain. In Jharkhand too, official data on the government portal shows fortified rice being distributed in two blocks of East Singhbhum (the designated Pilot district in the state) only from October 2021. However, without any data being shared on the portal about the distribution in other districts, fortified rice has already been taken to several districts. What is the meaning or purpose of the Pilot then?”, asked the fact-finding team members.

“Anaemia and other malnourishment conditions have to be tackled effectively and there is no doubt about it. However, the approaches have to be proven, holistic, natural, safe and community-controlled. Dietary diversity is an important approach and cannot be given the short shrift due to hasty adoption and attention to risky unproven approaches like food fortification. In Jharkhand, civil society groups have already demonstrated there are effective ways of dealing with nutrition holistically. Local, diverse foods (including uncultivated forest foods and traditional crops and varieties) play a key role along with participatory learning in these community-led approaches. The government has to expand its food security basket to include millets, pulses, eggs, cooking oil and milk in the food schemes. Nutrition Gardens should be scaled up along with support to extensive livestock systems that provide nutrition as well as support livelihoods. Further, a well-managed micronutrient supplementation program can be run with the supply of such micronutrients smoothened out and last mile delivery ensured”, recommended the report.

For more information, contact:

  1. Kavitha Kuruganti at 8880067772
  2. Balram at 8340395724
  3. Rohin Kumar at 9013971997


फॉर्टिफाइड चावल खिलाकर जनस्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करना बंद करे झारखंड सरकार

(कार्यकर्ताओं ने राज्य में फोर्टिफाइड चावल का वितरण बंद करने की मांग की) 

रांची, 11 मई 2022: झारखंड में रोज़ी रोटी अधिकार अभियान (आरटीएफसी) और अलायंस फॉर सस्टेनेबल एंड होलिस्टिक एग्रीकल्चर (आशा-किसान स्वराज) द्वारा 3 दिवसीय फैक्ट फाइंडिंग यात्रा के अंत में, टीम के सदस्यों ने झारखंड सरकार से आग्रह किया है की फोर्टीफाइड चावल के वितरण को तुरंत बंद किया जाए। फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट आज यहां एक संवाददाता सम्मेलन में जारी की गई। यह रिपोर्ट राज्य के गरीब परिवारों, आंगनबाड़ी और स्कूलों में फोर्टीफाइड चावल के अंधाधुंध वितरण के संबंध में कई गंभीर चिंताओं की ओर इशारा करती है।

फैक्ट फाइंडिंग टीम ने इस बात पर ज़ोर दिया कि झारखंड मे एनीमिया के उच्च स्तर होने के बावजूद, जिसमें मुख्यत आदिवासी जनसंख्या है और जिनमें थैलेसीमिया और सिकेल सेल एनीमिया जैसे गंभीर रक्त विकार मौजूद हैं – वहां आयरन फोर्टिफाइड चावल एनीमिया और कुपोषण से लड़ने का उपाय नहीं है। वास्तव में, फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थों पर एफएसएसएआई (FSSAI) के नियमों के अनुसार, अनिवार्य चेतावनी  वाली लेबलिंग देने का प्रावधान है – यह कि इसे थैलेसीमिया ग्रसितों को बिना चिकित्सक के सलाह के आयरन-फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थ न दिए जाएं। साथ ही सिकल सेल एनीमिया ग्रसितों को आयरन-फोर्टिफाइड पदार्थ का सेवन नहीं करने की चेतावनी देता है।

“एक तरफ, सरकार हमारे समाज में कई लोगों के लिए आयरन फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थ के सेवन से पड़ने वाले स्वास्थ्य जोखिमों को समझती है, और नियम बनाती है। वहीं दूसरी ओर, सरकार स्वयं अपनी सभी खाद्य योजनाओं में ऐसे चावल वितरित कर रही है जहाँ गरीबों के पास अपनी खाद्य सुरक्षा के लिए इस अधिकार (पीडीएस) पर निर्भर होने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। साथ ही झारखंड में जनसंख्या-आधारित जांच की कमी के कारण – कई थैलेसिमिया और सिकेल सेल एनीमिया से ग्रसित लोगों को शायद यह भी पता नहीं है कि उन्हें यह बिमारी है – जबकि फैक्ट फाइंडिंग टीम के अनुसार, सरकार बिना किसी उचित जानकारी या समुदायों के साथ बातचीत के फॉर्टिफाइड चावल वितरित कर रही है। क्षेत्र का दौरा करने से यह भी पता चला है कि बहुत से लोग इस चावल का सेवन करना पसंद नहीं करते हैं और यहां तक ​​कि पकाने और खाने से पहले फोर्टीफाइड चावल (कर्नेल) को अलग कर रहे हैं।

फैक्ट फाइंडिंग टीम में सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ वंदना प्रसाद जो रोज़ी रोटी अधिकार अभियान से भी जुड़ी हैं; आशा-किसान स्वराज से किसान अधिकार कार्यकर्ता कविता कुरुगंती; भोजन का अधिकार अभियान, झारखंड से बलराम और जेम्स हेरेन्ज; ग्रीनपीस इंडिया से रोहिन कुमार; आशा-किसान स्वराज से सौमिक बनर्जी और रोज़ी रोटी अधिकार अभियान-राष्ट्रीय सचिवालय के राज शेखर सिंह शामिल थे।

टीम ने 8, 9 और 10 मई 2022 को खूंटी और पूर्वी सिंहभूम जिलों के पांच गांवों का दौरा किया, जहां उन्होंने पीडीएस लाभार्थियों, डीलरों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के डॉक्टरों, आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, आंगनबाड़ी रसोइयों, चावल मिल मालिक एवं अन्य जिला स्तर के अस्पतालों के अधिकारियों और मरीजों से मुलाकात किया। टीम ने जमशेदपुर पूर्वी के विधायक सरयू राय और चाकुलिया विधायक समीर मोहंती से मुलाकात की। टीम के सदस्यों ने संबंधित राज्य स्तरीय अधिकारियों से भी बातचीत की और राज्य कैबिनेट मंत्री श्री रामेश्वर उरांव से भी मुलाकात करके जानकारी साझा की गई।

“प्रकाशित रिसर्चों और समीक्षाओं के अनुसार, फोर्टिफाइड चावल एनीमिया से प्रभावी ढंग से निपट सकता है, इसके प्रमाण मौजूद नहीं हैं।  यह आश्चर्य की बात है कि तथाकथित ‘पायलट’ के तीन साल पूरे होने से पहले ही, बिना मूल्यांकन और निष्कर्षों को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराए, भारत सरकार ने जल्दबाजी में देश के 257 जिलों में फोर्टीफाइड चावल के वितरण की शुरूआत कर दी है। झारखंड में भी, सरकारी पोर्टल पर उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि पूर्वी सिंहभूम (राज्य में घोषित पायलट जिला) के दो ब्लॉकों में अक्टूबर 2021 से फोर्टिफाइड चावल वितरित किया जा रहा है। हालांकि, अन्य जिलों में वितरण की जानकारी पोर्टल पर साझा किए बिना, कई जिलों में फोर्टिफाइड चावल पहले ही ले जाया जा चुका है। फैक्ट फाइंडिंग दल के सदस्यों ने पूछा- “तब इस पायलट का अर्थ या उद्देश्य क्या है?”

इसमें कोई संदेह नहीं है कि “एनीमिया और अन्य कुपोषण की स्थिति से प्रभावी ढंग से निपटना होगा। हालांकि, दृष्टिकोण प्रमाणिक, समग्र, सुरक्षित और समुदाय-नियंत्रित होना चाहिए। आहार विविधता एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण है। खाद्य फोर्टिफिकेशन के ज़रिए जल्दबाजी एवं जोखिम भरे अप्रमाणित तरीकों पर ध्यान केंद्रित करने से आहार विविधता के महत्व को दरकिनार करना ठीक नहीं है। झारखंड में, नागरिक समाजिक संगठनों ने अपने कई पहलों से प्रदर्शित किया है कि समग्र रूप से पोषण से निपटने के प्रभावी तरीके हैं। विविध खाद्य पदार्थ के साथ-साथ स्थानीय समुदाय के नेतृत्व वाले दृष्टिकोण में सहभागी शिक्षा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सरकार को खाद्य योजनाओं में बाजरा, दाल, अंडे, खाद्य तेल और दूध को शामिल करने के लिए अपनी खाद्य सुरक्षा टोकरी का विस्तार करना होगा। पोषण उद्यानों को व्यापक पशुधन प्रणालियों के समर्थन के साथ बढ़ावा दिया जाना चाहिए जो पोषण प्रदान करने के साथ-साथ आजीविका का समर्थन करते हैं। इसके अलावा रिपोर्ट की सिफारिश है कि एक अच्छी तरह से प्रबंधित सूक्ष्म पोषक तत्व पूरक कार्यक्रम ऐसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की आपूर्ति के साथ सुचारू रूप से चलाए जा सकते हैं जो अंतिम मील वितरण सुनिश्चित करने में सक्षम हो।”

अधिक जानकारी हेतु संपर्क करें –

कविता कुरुगंती 8880067772

बलराम 8340395724

रोहिन कुमार 9013971997

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